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धर्म वही है जो नाचता हुआ है। जो धर्म हंसी न दे
और जो धर्म खुशी-उत्साह न दे, वह धर्म, धर्म नहीं है।
कोई प्रबुद्ध कैसे बन सकता है? बन सकता है,
क्योंकि वो प्रबुद्ध होता है- उसे बस इस तथ्य को पहचानना होता है.
कोई चुनाव मत करिए. जीवन को ऐसे
अपनाइए जैसे वो अपनी समग्रता में है.
अर्थ मनुष्य द्वारा बनाये गए हैं . और क्योंकि आप लगातार अर्थ जानने में लगे रहते हैं ,
इसलिए आप अर्थहीन महसूस करने लगते हैं.
मानो नहीं, जानो। भागो मत, जागो। जो कुछ है,
वह आज अभी और यहीं है।
आप वही बन जाते हैं जो आप
अपने बारे में सोचते हैं -Osho(ओशो )
तुम जहां, जैसे हो, उस सबका कारण तुम्हीं हो।
तुम स्वयं को बदल कर इसे बदल सकते हो।
ध्यान चीज़ों को याद रखने की नहीं बल्कि
उनको भुलाने की प्रक्रिया है -Osho(ओशो)
तुम्हारी निर्भर होने की इच्छा के कारण ही तुम सब तरह के
संप्रदायों और पंथों के गुलाम हो गए।
तुम जहां, जैसे हो, उस सबका कारण तुम्हीं हो।
तुम स्वयं को बदल कर इसे बदल सकते हो।
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